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एससी, एसटी एक्ट में बदलाव आदेश के विरूद्ध अज्जाक्स ने सौपा ज्ञापन

गुरुवार, 29 मार्च 2018

/ by News Anuppur

अनूपपुर। म.प्र. अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ अनूपपुर द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय न्याय पीठ के द्वारा एसएलपी क्रमांक ५६६१/२०१७ दिनांक २० मार्च २०१८ को एससी, एसटी एक्ट में बदलाव हेतु दिए गए नियम/ आदेश के विरूद्ध संवैधानिक पीठ में पुर्नरीक्षण याचिका दायर किए जाने के संबंध में २९ मार्च को इंदिरा तिराहे में आमसभा कर रैली निकाल राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री के नाम एसडीएम अनूपपुर को सौपे। वहीं म.प्र अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष डॉ. एस.बी. चौधरी ने ज्ञापन के माध्यम से बताया कि अनुसूचित जाति/जनजाति अतयाचार निवारण अधिनियम १९८९ संविधान के संगत होकर संसद द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजाति की सुरक्षा और उनके साथ होने वाले जातीय अत्याचार पर न्याय प्रदान करने के लिए बनाया गया अधिनियम है, जिसमें यह स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि उसके विरूद्व की गई व्याख्या संवैधानिक न होकर विधि विरूद्व होगी। माननीय सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय न्याय पीठ द्वारा एससी, एसटी एक्ट के दुरूपयोग को रोकने के लिए इस अधिनियम में बदलाव किया है कि घअना की एफआईआर के बाद जांच अपराधी की गिरफ्तारी पर रोक, आरोपी शासकीय कर्मचारी होने पर गिरफतारी नियोक्ता अनुमति तथा अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना नियम/आदेश असंवैधानिक तथा अधिकार क्षेत्र से बाहर है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता १९७३ में संज्ञेय, अजमानती अपराध के आरोपी को पुलिस धारा ४१ में बिना वारंट, अनुमति के धारा ४२ में नाम और निवास नही बताने पर तथा धारा ४३ में प्रायवेट व्यक्ति को भी संज्ञेय अपराध के आरोपी को गिरफ्तार करने के अधिकार दिए गए है अर्थात भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत संज्ञेय, अजमानती अपराध तथा किसी भी अन्य दांण्डिक अधिनियम में आरोपी गिरफ्तार करने से पूर्व नियोक्ता की अनुमति आवश्यक नही होती केवल सशस्त्र सेना के अधिकारियो छोडकर तब माननीय सुप्रीय कोर्ट द्वारा एसीसी, एसटी एक्ट के अंतर्गत आने वाले संज्ञेय, अजमानती तथा गंभीर प्रकृति के अपराध के आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक, नियोक्ता की अनुमति नियम/आदेश पारित करना, एससी, एसटी एक्ट की धारा १८ के तहत अग्रिम जमानत को प्रतिबंधित किया गया तब माननीय न्यायालय को उक्त अधिनियम के संबंध में अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाने संबंधि नियम व आदेश विधि विरूद्ध है। भारतीय संविधान में शक्ति पृथम करण के सिद्धांत/आधार पर संसद को कानून, विधि बनाने, उसके संशोधन करने या समाप्त करने का अधिकार दिया गया है वहीं न्यायपालिका को संसद द्वारा बनाए गए कानून विधि को शून्य करने का अधिकार दिया गया है। माननीय न्यायालय द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर न्यायिक समीक्षा के माध्यम से एससी, एसटी एक्ट में  बदलाव संबंधी जो नियम आदेश पारित किया गया है वह अपास्त किए जाने योग्य है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में यह व्यवहारिता तथा शासकीय आंकडो से यह सत्य है कि अनुसूचित जाति, जनजाति वर्गो के साथ देश में प्रतिवर्ष हजारो, लाखो सत्य घटनाएं जैसे म.प्र. में बैरासिया के पास महासमंद में सर्व समाज के साथ खाना खाने से रोका गया, सतना में कुल्हाडी से काट कर फेंका गया, गुना व भिण्ड में शव को नही चलाने दिया गया, भंडारा में बस्ती जलाई गई, रतलाम में दूल्हे को घोडे पर नही निकलने दिया गया, जनप्रतिनिधियो को राष्टीयध्वज फहराये जाने से गंभीर अमानवीय तथाि भीभतस घटनाएं होती रही है। यदि कहीं किसी प्रकरण विशेष में एससी, एसटी एक्ट का दुरूपयोग हुआ है तो उसके विरूद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए। दुरूपयोग की भारतीय दंड संहिता या अन्य किसी भी कानून का होने की संभावना से इंकार नही किया जा सकता। उन्होने बताया कि तमाम आरोपी धारा ३०२, ३०७, ३७६ या अन्रू कानून जैसे देशद्रोह, टाडा, भ्रष्टाचार, आंतकवादी घटनाओ से संबंधित दोष मुक्त हो जाते है फिर भी उन कानूनो में आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक, नियोक्ता की अनुमति संबंधी आदेश पारित नही किए गए।  एससी, एसटी एक्ट के दुरूपयोग को रोकने के संबंध में ही इस तरह के आदेश पारित करने से अनुसूचित जाति/ जनजाति वर्ग में असुरक्षा, भय या अत्याचार की घटनाओ को बढावा देगा, जिस पर संघ ने भारत शासन से देश में सामाजिक ताना बाना बनाए रखने के साथ एससी,एसटी एक्ट को पुन: मूल रूप में किया जाना अति आवश्यक है। जिसके लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के समक्ष भारत सरकार के द्वारा पुर्नरीक्षण याचिका की जाए।

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